शनिवार, 19 फ़रवरी 2011

हितेछ अंकल का ग्लीह प्लवेछ

छनिवार 12 फरवरी... को मैं औल मम्मा ज्योति आंती के छाथ हितेछ अंकल के यहां उनके ग्लीह प्लवेछ में गए थे... मुझे वहां थूब मजा आया... ज्योति आंती के छाथ उनके गाली पर थंदी-थंदी हवा खाते हुए खूब मछ्ती छूज लही थी... फिल हितेछ अंकल के घल पर कभी आंती की गोदी में, कभी हितेछ अंकल की गोदी में... तो कभी ज्योति आंती... तो कभी नैना आंती की गोद... छबके छाथ मुझे खूब अच्छा लगा...क्योंकि मम्मा-पापा दोनों के ऑफिछ जाने की वजह छे मुझे ज्यादा मौका नहीं मिलता है बाहल जाने का... लौटते वक्त मेले छल छे तोपी उल गई... तो छल पर ऐसी हवा लगी कि पूछिए मत... मेला तो मन कल लहा था कि बछ लॉन्ग ड्लाइव पल निकल जाऊं... खैल अभी उछमें ताइम है... अभी तो पापा छे गाली भी खलीदवानी है...
अब मैं लिखते-लिखते थक गई... इछलिए बाय बाय...

3 टिप्‍पणियां:

  1. अगली बार मुझे भी साथ ले चलना बिटिया

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  2. दल्दी थे गाली खालिद्वाओ तो मैं भी तुम्हाले छाथ धुमने तलूँगा... दल्दी दल्दी बलि हो दो हम दोनों छाथ छाथ एक थाथ धुमने दायेंगे... थुब थारा मछ्ती कलो... मेला धेल साला प्याल...

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  3. वाह वाह सिद्धि बेटा! बहुत मजा आया हमको भी। अब जल्दी से पापा मम्मा के साथ दोबारा घर आओ

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